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देहरादून के जामा मस्जिद के शाही इमाम और शहर काजी मोहम्मद अहमद कासमी के इंतकाल के बाद देहरादून में अलग-अलग जगह पर उनके लिए मगफिरत की दुआएं मांगी गई। देहरादून बार के मुस्लिम अधिवक्ताओं और दानिशवरो ने भी शहर काजी मोहम्मद अहमद कासमी कि मगफिरत के लिए दुआओं का एहतमाम किया। जिसमे शामिल हुए अधिवक्ता और दानिशवरो ने उनको याद किया और अल्लाह से उनकी मगफिरत के लिए दुआएं की।

इस मौक़े पर शहर काजी मोहम्मद अहमद कासमी कि जिंदगी को याद किया गया। उनकी शख्सियत ऐसी थी कि वो जिस शख्स से मिलते थे वह उनका ही हो जाता था। नर्म लहजा बातो मे मिठास और अपनापन यही उनकी पहचान थी। जब कोई उनसे मिलना चाहता था तो वह कभी भी किसी से मिलने को मना नहीं करते थे उनकी बात सुनते और अगर किसी को उनसे कोई काम होता था तो वह उनका काम करते फिर चाहे वह कोई दुनियावी मसला हो या फिर दीन का मसला हो वह उसे सुलझाने मे मदद करते। शहर काजी कि कैसी शख्सियत थी इस बात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि उनके इंतकाल के बाद जिसको भी खबर लगी वह उनके जनाजे में शामिल होने के लिए देहरादून पलटन बाजार मस्जिद पहुंचा और जब पलटन बाजार मस्जिद में उनके जनाजे की नमाज अदा की जा रही थी उसे वक्त देहरादून और देहरादून के आसपास के इलाकों के लोग हजारों की संख्या में उनके जनाजे की नमाज में शिरकत करने पहुंचे थे इतना ही नहीं देहरादून के हर धर्म के लोग मुस्लिम ही नहीं दूसरे धर्म के लोग भी उनके जनाजे में शामिल हुए।

शहर का जी मोहम्मद अहमद कासमी के इंतकाल के बाद बहुत सारे लोग अभी भी गम में है और उनको याद कर रहा है। शहर काजी मोहम्मद अहमद कासमी के दुनिया से चले जाने के बाद उनकी जगह खाली हो गई है हालांकि उनकी जगह उन्हीं की तरह संभालना आसान काम नहीं है क्योंकि 45 साल तक वह शहर काजी रहे और आज तक किसी भी तरह के विवाद मे उनका नाम नहीं आया और ना ही उन्होंने कभी भी इस तरह का बयान दिया है जो विवादित रहा है। वह हमेशा अमन परस्ती की बात करते रहे हैं और मुल्क के अमनो अमान के लिए दुवाए करते रहे। शहर काजी मोहम्मद अहमद कासमी के लिए जो दुआएं मांगी गई उसमें अधिवक्ता रजिया बेग, हसन मंसूर, अलमाश सिद्दीकी, शाहिद अहमद, आबिद अली, नसीम बेग, सहित कई दानिशवर जिनमे लताफत हुसैन, सूफी खलीक अहमद, अतहर नकवी साहब शामिल हुए।

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