उधम सिंह नगर: उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले में फर्जी जाति और निवास प्रमाणपत्रों के बढ़ते नेटवर्क ने राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिले के बाजपुर और गदरपुर समेत कई इलाकों में फैला यह सिंडिकेट सिर्फ बिचौलियों का खेल नहीं, बल्कि प्रशासनिक महकमे के मौन संरक्षण में पनप रहा एक संगठित भ्रष्टाचार का उदाहरण बनता जा रहा है।
हर बार फर्जीवाड़ा उजागर होने पर कार्रवाई का चाबुक केवल आवेदकों या प्राइवेट बिचौलियों पर ही चलाया जाता है, जबकि जांच की संस्तुति देने वाले निचले अमले और डिजिटल हस्ताक्षर करने वाले उच्च अधिकारियों को हर बार बचा लिया जाता है।

पटवारी की संस्तुति और भौतिक सत्यापन पर उठे सवाल
नियमों के अनुसार, किसी भी स्थायी निवास या जाति प्रमाणपत्र को जारी करने से पहले संबंधित क्षेत्र के पटवारी/राजस्व उपनिरीक्षक की मुख्य जिम्मेदारी होती है। पटवारी को मौके पर जाकर भौतिक सत्यापन करना होता है, आवेदक के मूल अभिलेखों की पड़ताल करनी होती है और उनकी सत्यता की पुष्टि के बाद ही फाइल को आगे बढ़ाना होता है। पटवारी की हरी झंडी मिलने के बाद ही फाइल सक्षम अधिकारी तक पहुंचती है, जहां डिजिटल हस्ताक्षर से प्रमाणपत्र जारी होता है।ऐसे में सवाल उठता है कि लाखों की सैलरी लेने वाले और उच्च शिक्षित पटवारी क्या इतने नासमझ हैं कि असली और स्कैन किए गए फर्जी दस्तावेजों में फर्क न पहचान सकें? अगर वे असली-नकली का फर्क नहीं समझ पा रहे, तो उनकी योग्यता पर सवाल है; और अगर सब कुछ जानते-बूझते फर्जी फाइलों को आगे बढ़ाया जा रहा है, तो यह सीधे तौर पर पदीय कर्तव्यों के साथ गद्दारी और भ्रष्टाचार का मामला है।केवल बिचौलियों को बलि का बकरा क्यों?मामला उजागर होने पर विभाग कागजी खानापूर्ति करते हुए प्रमाणपत्र निरस्त कर देता है या किसी प्राइवेट सेंटर चालक/बिचौलिए पर मुकदमा दर्ज करवाकर अपना पल्ला झाड़ लेता है। लेकिन सवाल यह है कि:कागजी फर्जीवाड़े की नींव रखने वाले पटवारियों पर सख्त एक्शन क्यों नहीं होता?

डिजिटल दस्तखत करने वाले ‘साहबों’ की जवाबदेही तय क्यों नहीं की जाती?
जब तक मामला सुर्खियों में न आए, तब तक राजस्व तंत्र गहरी नींद में क्यों सोया रहता है?
प्रशासनिक अधिकारियों के रटे-रटाए बयान और सिर्फ बिचौलियों पर कार्रवाई यह दर्शाती है कि विभाग की प्राथमिक दिलचस्पी अपनी साख बचाने और लीपापोती करने तक सीमित है।प्रशासन का पक्षमामले की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय प्रशासन जांच की बात कह रहा है।
महज कुछ प्रमाणपत्र निरस्त कर देने या प्राइवेट एजेंटों पर मुकदमे ठोक देने से राजस्व विभाग अपनी आपराधिक जवाबदेही से मुक्त नहीं हो सकता। जब तक इस सिंडिकेट की जड़ों पर वार नहीं किया जाएगा और मुख्य सूत्रधारों को कटघरे में नहीं लाया जाएगा, तब तक यह खेल थामना नामुमकिन है। अब समय आ गया है कि शासन स्तर से इस पूरे तंत्र की निष्पक्ष जांच कराई जाए और फर्जी फाइलों को हरी झंडी देने वाले भ्रष्ट कर्मचारियों व अधिकारियों को सेवामुक्त कर सलाखों के पीछे भेजा जाए।
